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श्री परशुरामाची आरती Shree Prashuram Aarti

श्री परशुरामाची आरती Shree Prashuram Aarti
, मंगळवार, 7 मे 2024 (16:37 IST)
जमदग्नीकुळभूषण मुक्ताफळदशना । 
अतिसज्जन मनमोहन रजनीकरवदना ॥ 
अगणित महिमा तुझा न कळे सुरगणां । 
वदतों कंठीं वाणी सरसीरुहनयना ॥१॥ 
 
जय राम श्रीरम जय भार्गवरामा । 
नीरांजन करुं तुजला परिपूर्णकामा ॥ध्रु०॥ 
 
सह्याद्रिगिरिशिखरी शर घेउनि येसी । 
सोडुनि शर पळवीसी पश्चिमजलधीसी ॥ 
तुजसम रणधीर जगीं न पडे दृष्टीसी । 
प्रताप थोर तुझा नकळे कवणासी ॥ जय० ॥२॥ 
 
तव कोप बहु पापी बाणें संहारी । 
दानवदहन करुनी वससी गिरिशिखरीं ॥ 
क्षत्रिय मारुनि अवनी केली निवैंरी । 
सात्त्विक राजस तामस त्रिगुणां उद्धरी ॥ जय० ॥३॥ 
 
द्रुढ भावें तव वंदन करिती जे चरणीं । 
त्यांतें भवभय नाहीं जंववरि शशितरणी ॥ 
शर मारुनी उद्भविली गंगा जनतरणी । 
चिंतामणि शरणागत निश्चित तव चरणीं ॥ जय राम श्रीराम० ॥४॥
 
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शौर्य तेज बल-बुद्घि धाम की॥ 
रेणुकासुत जमदग्नि के नंदन।
कौशलेश पूजित भृगु चंदन॥
अज अनंत प्रभु पूर्णकाम की।
आरती कीजे श्री परशुराम की॥1॥
 
नारायण अवतार सुहावन।
प्रगट भए महि भार उतारन॥
क्रोध कुंज भव भय विराम की।
आरती कीजे श्री परशुराम की॥2॥
 
परशु चाप शर कर में राजे।
ब्रह्मसूत्र गल माल विराजे॥
मंगलमय शुभ छबि ललाम की।
आरती कीजे श्री परशुराम की॥3॥
 
जननी प्रिय पितृ आज्ञाकारी।
दुष्ट दलन संतन हितकारी॥
ज्ञान पुंज जग कृत प्रणाम की।
आरती कीजे श्री परशुराम की॥4॥
 
परशुराम वल्लभ यश गावे।
श्रद्घायुत प्रभु पद शिर नावे॥
छहहिं चरण रति अष्ट याम की।
आरती कीजे श्री परशुराम की॥5॥
 
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ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी।
ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी।
सुर नर मुनिजन सेवत, श्रीपति अवतारी।। ऊॅं जय।।
 
जमदग्नी सुत नरसिंह, मां रेणुका जाया।
मार्तण्ड भृगु वंशज, त्रिभुवन यश छाया।। ऊॅं जय।।
 
कांधे सूत्र जनेऊ, गल रुद्राक्ष माला।
चरण खड़ाऊँ शोभे, तिलक त्रिपुण्ड भाला।। ऊॅं जय।।
 
ताम्र श्याम घन केशा, शीश जटा बांधी।
सुजन हेतु ऋतु मधुमय, दुष्ट दलन आंधी।। ऊॅं जय।।
 
मुख रवि तेज विराजत, रक्त वर्ण नैना।
दीन-हीन गो विप्रन, रक्षक दिन रैना।। ऊॅं जय।।
 
कर शोभित बर परशु, निगमागम ज्ञाता।
कंध चार-शर वैष्णव, ब्राह्मण कुल त्राता।। ऊॅं जय।।
 
माता पिता तुम स्वामी, मीत सखा मेरे।
मेरी बिरत संभारो, द्वार पड़ा मैं तेरे।। ऊॅं जय।।
 
अजर-अमर श्री परशुराम की, आरती जो गावे।
पूर्णेन्दु शिव साखि, सुख सम्पति पावे।। ऊॅं जय।।
 
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